रातों का जागना
दो साल के करीब होने जा रहा है। जब एक महीने के बाद नाइट शिफ्ट लग ही जाती है। जब दुनिया थकान की चादर ओढ़े सो रही होती है तो मैं थकान की चादर बुन रहा होता हूं। लेकिन रातों की थकान की चादर थोड़ी अजीब सी होती है। इसका एक अलग ही खुमार होता है। मन बहलाने के लिए कहे तो इसका एक अलग ही मजा होता है। जो आपको बिना कुछ किए ही थका देती है। और वो एक ऐसी थकान होती है, जो न तो सोने देती है और न हीं खड़ा रहने की इजाजत देती है। एक ऐसी थकान होती है जो बस आपके आंखों से बाहर टपकती रहती है। खैर इसका भी एक अलग ही मजा है। प्रकृति के उलट जगने का मजा... कभी मौका मिले तो जरूर ले के देखिए...
Comments
hai ..padhkar bas aapke blog ko padhne ka man hua par yahan to bhai bahut khalipan hai kuch to likho dost..kyuki tum jab likhoge to lagta hai bas kamal lokhoge...hum tumhe padhna chahte hai isliye kuckh likh do...